आखिरी सांसें
विषय -- माया मोह के बंधन
शीर्षक -- आखिरी सांसें
विधा -- कहानी
लेखिका -- अनिला द्विवेदी तिवारी
शकुंतला जी जब व्याह करके घर पर नई-नई आईं थी, तब उनकी दादी सास ने उन्हें कुछ सुझाव दिए थे।
उनके सुझावों का अनुसरण कर वे जीवन भर, उसी के अनुसार, घर पर हर छोटी-बड़ी बातों का ध्यान रखती रहीं।
यह कह सकते हैं कि यह गुण उन्हें अपनी दादी सास से विरासत में ही मिला था।
ध्यान ही क्या कहा जाए या ध्यान की भी अति कहें तो अतिशयोक्ति न होगी!
सुबह उठते से घर का दरवाजा खोलना, दरवाजे पर झाड़ू फेरना।
फिर आकर स्नान करना, अपने बगीचे से फूल चुनना। पूजा करना उसके बाद अपने खुद के लिए चाय बनाकर पीना।
अखवार वाले का पैसा दिया गया या नहीं?
धोबी का पैसा दिया गया या नहीं?
घर के अन्य काम वालों को समय पर पैसे मिले अथवा नहीं?
पोते का क्या सामान खत्म है? क्या अभी जरूरत है, से लेकर घर के हर सदस्य और हर आने जाने वाले की व्यवस्था बनाना उनकी आदत में शामिल था!
गैस कब से शुरू हुई कब खत्म हुई आदि, आदि?
उनकी पहली चाय के हजम होते तक, उनके पति सुरेश जी भी सोकर उठ जाते। तब वे भी नहाकर पूजा करते फिर उनकी चाय बनती। कभी कभार सुरेश जी खुद भी अपनी चाय बना लेते थे।
सुरेश जी के साथ, शकुंतला जी की चाय की दूसरी पारी भी हो जाती थी।
कभी यदि शकुंतला जी देर तक सोकर नहीं उठीं, तो सुरेश जी को यह समझते देर नहीं लगती थी कि जरूर शकुंतला जी की तबियत सही नहीं है।
फिर दोपहर के खाने की तैयारी करना। बचा हुआ खाना फ्रिज में रखा गया है या नहीं? यह नजर रखना।
सुबह का खाना बचा हुआ है तो रात्रि में हिसाब से दाल, सब्जी बनाना ताकि अगले दिन के लिए अधिक ना बचे।
फिर रात्रि में वही सबके खाने के बाद
थोड़ा-बहुत बचा खाना फ्रिज में समेट कर रखना।
अगले रोज अपने भोजन में समेटकर खाने के लिए! क्योंकि कोई अन्य तो ठंडा खाने से रहा इसलिए वह खाना शकुंतला जी के हिस्से में ही आता था।
ये भी बात सच है कोई शकुंतला जी को यह नहीं कहता था कि बासी खाना खाओ परंतु व्यर्थ फेंका ना जाए इसलिए वे ठंडा गर्म सब खा लेती थीं।
फिर चारों तरफ नजर रखते हुए रात में बत्ती बुझाने तक उनका सफर चलता रहता।
कहने को बहू-बेटियां घर पर थीं लेकिन एक बार सब कुछ चेक करना मानो उनकी आदत में शामिल था।
कहीं कोई नल चलता तो नहीं छूट गया। कपड़े छत पर से उतार कर अंदर किए हैं या नहीं!
उनका यह सिलसिला तीन सौ पैंसठ दिन चलता था कहीं कोई बदलाव नहीं।
आजकल उनकी तबियत कुछ ठीक नहीं चल रही थी। अधिक समय उनका बिस्तर पर ही बीत रहा था लेकिन मन में फिर भी यही चलता रहता था कि सब कुछ ठीक ढंग से घर पर चल रहा है या नहीं!
हर व्यक्ति के लिए सोचना उनकी मानो जिम्मेदारी बन गई थी।
कोई भी आने-जाने वाला कभी उनके दर से भूखा नहीं जाता था!
अपने क्या, पराए रिश्तेदार (दूर-दूर के रिश्तेदार) भी उनके घर पर आते रहते थे।
आज उनके परिवार जन उन्हें अस्पताल लेकर जाने वाले थे। तभी उन्होंने बेटी से कहा,,, "खाना फ्रिज में रख दो वर्ना खराब हो जाएगा।"
और बाहर की ओर देखा जहाँ मौसम बरसात वाला हो रहा था, तो वह खुद ही छत की ओर भागती गईं। ये कहते हुए कि,,, "मैं कपड़े उतार लाऊँ, नहीं तो गीले हो जाएंगे। बारिश होने वाली है।"
सुरेश जी ने कहा,,, "शकुंतला तुम डॉक्टर के यहाँ चलो अभी।
घर में इतने लोग हैं अपने कपड़े छत से उतार लेंगे। तुम दिन रात इसी चिंता में घुली जा रही हो। अपनी सेहत के बारे में भी कभी सोच लिया करो।"
लेकिन शकुंतला जी भी छत पर से कपड़े उतारने के बाद ही डॉक्टर के यहाँ गईं।
एक दिन तेज आँधीं के साथ बरसात शुरू हो गई तो शकुंतला जी बहू के गाउन भी छत पर से उतार लाईं जो हल्के गीले थे, फिर बहू, बेटे से बहस करने लगी,,,
"माँ ने गीले कपड़े उतार दिए, सूखने भी नहीं दिए।"
बेटा भी पत्नी को समझाता रहा कि,,, "तेज बारिश में कपड़े अधिक गीले हो जाते इसलिए माँ ने उठा दिया है। तुम कमरे में पंखे के नीचे डाल दो तो सूख जाएंगे। इसमें इतना क्लेश करने की क्या बात है!"
शकुंतला जी ने यह बातें सुनीं तो उन्हें भी बुरा लगा। उनके पति सुरेश जी ने मना किया,,, "अब से बहू के कपड़े वहीं पड़े रहने देना।"
दो चार दिन तो सबके कपड़े शकुंतला जी ने छत में शेड के नीचे पड़े रहने दिए। अपने वहीं के वहीं उठाकर नहाने के बाद पहन लेती थीं।
उनसे यह नहीं हुआ कि बहू के कपड़े पड़े रहने दे, बाकी सब के उठाएं इसलिए सबके ही पड़े रहने दिए।
लेकिन कुछ दिनों बाद फिर सब कुछ भूलकर, वही सिलसिला चालू हो जाता।
इसी तरह रसोई में ढेर सारा सामान देखकर शकुंतला जी सब समेट कर व्यवस्थित करतीं।
बहू जब कहने लगती फलां सामान नहीं मिल रहा गुस्से में और फैला देती।
तब शकुंतला जी दो-चार दिन फिर सहेज-सम्हाल बंद कर देती।
लेकिन दो-चार दिन बाद सब कुछ भुलाकर फिर वही अपने पुराने ढर्रे पर आ जाती थीं।
अपने पोते के कपड़े भी जब नहाने जातीं, तब दो-चार सेट धो डालतीं।
कभी-कभी तो दोपहर में भी दो-चार सेट धो देती थीं।
बहू तो मशीन में डालकर घुमा देती तो उन्हें साफ नहीं लगते थे। बल्कि और एक दूसरे का रंग कपड़ों में चढ़ जाता था।
कोई लाख समझाए पर उन्हें समझ में नहीं आता था। इधर-उधर कुछ भी पड़ा हुआ नुकसान देखतीं तो मानो उनका रत्ती भर खून सूख जाता था।
शकुंतला जी भी क्या करतीं मोह-माया के बंधन में जो बंधी थी।
तिनका-तिनका जोड़कर अपनी गृहस्थी जो बसाई थी उसको उजड़ते हुए भी तो नहीं देख सकती थीं।
कोई कितना भी उनका अपमान करे, निरादर करे या झिड़कता रहे, उन्हें तो बस कहीं कुछ बिगड़ने ना पाए का भूत ही सदा सवार रहता था।
वक्त बीतता रहा, शकुंतला जी अधिक बीमार रहने लगीं। अब उनसे घर की सहेज सम्हाल भी नहीं की जाती थी।
बिगड़ता भी है तो दूर से देखती रहतीं थी। भले ही मन ही मन कुढ़ती रहतीं, पर किसी को कुछ नहीं कहती थीं।
वे जब तक स्वस्थ्य रहीं, घर पर आर्थिक सहयोग भी बहुत करती रहतीं थी। अतः बहू-बेटों पर कभी अधिक आर्थिक भार नहीं आता था।
पोते का भी अधिक से अधिक सामान वही खरीद कर लाती थीं। उसकी देखरेख भी बहुत अच्छे से करती थीं।
लेकिन घर पर वही कीमत, घर की मुर्गी दाल बराबर ही थी। जब काम बनता तब कोई एक बोल भी सराहना नहीं करता था।
परंतु यदि गलती से भी कोई काम बिगड़ जाए, फिर तो घर भर के लोग तानों की बौछार कर देते थे।
शकुंतला जी भी थोड़े समय तक मन में सोचती रहतीं, फिर कुछ ही देर में सारा मान-अपमान भुला कर अपने काम में लग जातीं।
घर में कुछ बिगड़ने भी कैसे देतीं, बूंद-बूंद से ही तो अपना घड़ा भरा था।
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आज शकुंतला जी के घर पर मेहमानों और जानने पहचानने वालों का जमावड़ा भरा पड़ा था।
क्योंकि अब शकुंतला जी दुनिया में नहीं रहीं थी।
बहू आज रो-रो कर उनकी सारी पिछली बातों को याद कर रही थी।
कुछ किस्से बेटी सगे संबंधियों को सुना रही थी।
आज भी, उन्होंने अपने बिस्तर से उतर कर रसोई में झांका था और कहा था,,, "रुद्रा की स्कूल से छुट्टी का समय हो रहा है रश्मि, तुम अभी तक स्कूल नहीं गई!
ऐसा कहकर वे पलटीं और एक जोर की हिचकी के साथ वे वहीं पर गिर गईं।
जब तक रश्मि उनके पास पहुँची, तब तक उनकी साँसें थम चुकीं थी।
रश्मि जब जोर-जोर से चीखने लगी तब घर के बाकी सभी लोग भी इकट्ठे हो गए।
फिर तो देखते ही देखते घर में लोगों का हुजूम लग गया।
शकुंतला जी घर, परिवार, रिश्तेदारों के साथ-साथ मोहल्ले-पड़ोस के लोगों की भी चहेती जो थीं।
आज शकुंतला जी की बहू रश्मि और बेटी संध्या दोनों को समझ आ रहा था कि वे कितनी परवाह करतीं थी। सारा घर सम्हाल रखा था।
यही आखिरी सच है, ये माया-मोह के बंधन जिंदगी की आखिरी साँसों तक व्यक्ति को जकड़े रहते हैं।
जैसा कि शकुंतला जी के साथ हुआ!
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Mohammed urooj khan
30-Jan-2024 12:08 PM
👌🏾👌🏾👌🏾👌🏾
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Alka jain
28-Jan-2024 04:48 PM
Nice
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Milind salve
28-Jan-2024 04:41 PM
Nice one
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